सारा ने की ज़बरदास्त शुरुआत केदारनाथ से… फिल्म का हिंदी रिवयू

Kedarnath Movie Review
Sara Ali Khan shines in Abhishek Kapoor's Kedarnath

दीपा गहलोत 

बॉलीवुड के कई डायरेक्टरों के दिलो दिमाग में हॉलीवुड के स्तर की फिल्म बनाने की चाहत होती है। इसलिए ही ऐसा होता है कि कभी पाइरेट्स ऑफ कैरेबियन की नकल करके एक फिल्म औंधे मुंह गिरती है तो कभी टाइटेनिक की नकल वाली फिल्म डूब जाती है। 

अभिषेक कपूर की केदरानाथ ने एक ही साथ कई चीजों या यूं कहें कि मसालों को भरने की कोशिश की नतीजा ये रहा कि फिल्म में दिखा कुछ नहीं । फिल्म उत्तराखंड के तीर्थस्थान केदारनाथ धाम में फिल्माई गई है जिसकी खूबसूरती तुषार कांति रे के कैमरे ने शानदार ढंग से दिखाया है। अब फिल्म के मसालों पर गौर कीजिए, इसमें प्रेम कहानी है, वर्ण व्यवस्था और धार्मिक टकराव भी हैं, प्रकृति की चेतावनी और त्रासदी भी है। इन सबको एक साथ मिलाकर फिल्म बनाई गई है लेकिन एक भी पक्ष ढंग से उभर कर स्क्रीन पर दिखा नहीं । 

अब कहानी पर नजर डालिए। मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत) केदरानाथ धाम तक लोगों को अपनी पीठ या घोड़े पर बिठाकर दर्शन करवाते हैं जिसे पिट्ठू कहते हैं। मंसूर का धर्म उनके काम में कभी आड़े नहीं आता और वो स्थानीय लोगों की ही तरह मंदिर की घंटियां भी बजाते हैं और मंत्रोच्चार भी करते हैं। मंदाकिनी उर्फ मुक्कु (सारा अली खान) मंदिर के पुजारी और जमींदार की बेटी है जो इस वजह से चिड़चिड़ी रहती है क्योंकि घरवाले उसकी शादी उसी की बड़ी बहन वृंदा (पूजा गौर) के मंगेतर कुल्लू (निशांत दहिया) से जबरदस्ती करना चाहते हैं। अब फिल्म में ये साफ नहीं किया गया कि क्यों अपनी ही बड़ी बेटी पर मां बाप इस तरह का इमोशनल अत्याचार और बेइज्जती कर रहे हैं लेकिन इससे फिल्म में इतना तो हुआ कि वृंदा के गुस्से का कारण समझ में आ जाता है। 

फिल्म में ये भी साफ नहीं है कि क्यों मुक्कु का दिल मंसूर पर आ जाता है, ऐसा भी नहीं है कि मुक्कु को लड़कों की कमी है, उसके फेसबुक प्रोफाइल को ही देखकर शादी के लिए लड़कों की लाइन लगी रहती है। लेकिन मुक्कु मंसूर के पीछे इस कदर पड़ती है कि आखिरकार सफल हो ही जाती है। फिल्म में इन दोनों का प्यार परवान चढ़ाने के लिए एक बार फिर बिना कारण बताए या दिखाए दोनों को कुछ दिनों के लिए पर्वत पर जाते दिखाया गया है। रास्ते में दोनों की इश्कबाजी परवान चढ़ती है, एक ही ग्लास से चाय पीते हैं और एक तूफानी रात में आग के किनारे दोनों का किस सीन भी है। 

फिल्म में इस बीच कुछ विवाद भी पनप रहे होते हैं। लालची कुल्लू चाहता है कि एक होटल बनाया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा पर्यटक शहर में आएं, लेकिन समझदार मंसूर ऐसा करने से मना करता है क्योंकि जमीन पर होटल बनने से बोझ पड़ेगा और पहाड़ों की जमीन पर बोझ पड़ने का मतलब त्रासदी को दावत देना होता है। बस इसी समय मंसूर के धर्म को लाठी बना उस पर बरसा दिया जाता है। उत्तराखंड में आए जल प्रलय को शुरुआत में ही बता दिया गया था, इसलिए इसको लेकर दर्शकों को कोई आश्चर्य नहीं होता लेकिन मुसलमान पिट्ठुओं और पंडितों के बीच का संघर्ष बिना किसी चेतावनी के ही फिल्म में आ जाता है और इतना ही नहीं इसमें कुल्लू बिना किसी बातचीत के एकदम तानाशाह के अंदाज में सभी पिट्ठुओं को बाहर करने का फैसला ले लेता है और इसका कोई विरोध भी नहीं होता है। 

मुक्कु की बहन उससे जलती तो है ही , तो उसके प्यार की कहानी भी वो घर पर बता देती है। अब मुक्कु की जबरदस्ती शादी कर दी जाती है। अब देखिए होटल अभी बना नहीं है लेकिन पहाड़ का एक हिस्सा टूटता है और अपने साथ घर और लोगों को बहा ले जाता है, जबकि दूसरी तरफ नदी में जबरदस्त उफान आता है और यहीं से फिल्म सीधे सीधे जल प्रलय की तरफ बह निकलती है बिल्कुल टाइटैनिक की तरह, फर्क सिर्फ इतना है कि इस फिल्म में पर्दे पर टाइटैनिक जैसा डर या तनाव नहीं दिखता । 

लगभग 150 मिनट की इस फिल्म को देखने के बाद कुछ बातें बिल्कुल साफ हो जाती हैं – ये पैसा वसूल कतई नहीं है, इसकी प्रेम कहानी में चिंगारी नहीं है, धार्मिक संघर्ष में आग नहीं है और जल प्रलय में कोई प्रभाव नहीं है। अगर इस पूरे गड़बड़झाले से कोई सुरक्षित बच कर निकला है तो वो हैं सारा अली खान । उन्होंने फिल्मी दुनिया में एक मजबूत कदम रखा है और निश्चित तौर पर आने वाले समय में उन्हें अपनी अभिनय क्षमता को साबित करने के और मौके मिलेंगे । 

केदारनाथ 

निर्देशक – अभिषेक कपूर 

कलाकार – सुशांत सिंह राजपूत, सारा अली खान, निशांत दहिया, पूजा गौर, नीतिश भारद्वाज और अन्य 

रेटिंग – 2 स्टार 

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Deepa Gahlot is one of India’s seniormost and best known entertainment journalists. A National Awardwinning film critic, Deepa has watched more movies and theatre than most people in the country. An author of several books on film and theatre, she has had an extremely successful run as head of theatre and film at the National Centre for Performing Arts, Mumbai, during which she helped nurture several original productions. For Xyngr, Deepa Gahlot reviews theatre and cinema.