नैतिकता की थोड़ी ज़्यादा खुराक

Why Cheat India movie review

दीपा गहलोत

‘व्हॉई चीट इंडिया’ में भारत की शिक्षा प्रणाली की जो समस्या दिखाने की कोशिश की है , दरअसल ये व्यवस्था उससे कहीं ज्यादा गहरे दलदल में है। शिक्षा प्रणाली की इस सड़ांध को फिल्म के अंत में आंकड़ों के जरिए दिखाने की कोशिश की गई है लेकिन फिल्म की कहानी ही लापरवाह और स्वार्थी है जिसमें यही दिखाने की कोशिश की गई है कि अगर कीमत सही है तो सभी भ्रष्ट हैं। ऐसा लगता है कि हमारी परंपरा ही शिकार हुए लोगों से ज्यादा मनचले बेईमानों के गुण गाने की है।

एक दुखद सच ये भी है कि आरक्षण, प्रतिव्यक्ति शुल्क, घटिया शिक्षक, निराशाजनक और बेकार पढ़ाई के तरीके जिससे छात्र सिर्फ रट्टू तोता बनकर रह जाते हैं और दूसरी और बाधाओं के चलते ही पैसे वाले मां-बाप अपने पढ़ाई में तेज बच्चे के मौके मजबूत करने के लिए या फिर फिसड्‍डी बच्चे का करियर संवारने के लिए राकेश सिंह ( इमरान हाशमी) जैसे धूर्त व्यक्ति की सेवाएं लेकर अपने बच्चे को प्रसिद्ध इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलवा सकते हैं, क्योंकि प्रोफेशनल संस्थान में दाखिले का मतलब परिवार की आर्थिक सुरक्षा की गारंटी होता है।

राकेश का युवाओं में बड़ा क्रेज है और वो उसे रॉकी भैया कहते हैं । रॉकी खुद इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में फेल हो चुका था जिससे उसके पिता बेहद नाराज थे। लेकिन रॉकी ने अपने तेज दिमाग का इस्तेमाल किया और एक नेटवर्क बनाकर एक बड़ा फर्जीवाड़ा चलाया जिसमें आईडी कार्ड में हेरफेर कर पढ़ाई में तेज बच्चों को  फिसड्डियों की जगह इम्तिहान में बिठाकर वो परीक्षा दिलाता है। पुलिसवालों से लेकर मंत्रियों तक को वो पैसे देता है जिससे उसका ये फर्जीवाड़ा बिना रुके चल सके। रॉकी को सबके बारे में सबकुछ पता होता है, वो जानता है कि जज्बात की किस चाभी से लाभ के नए दरवाजे कैसे खुलेंगे। रॉकी 1987 में हॉलीवुड में आई फिल्म वॉल स्ट्रीट में माइकल डगलस के किरदार गॉर्डन ग्रीको के मशहूर डॉयलॉग ग्रीड इज गुड यानि ’लालच अच्छा है’ बार बार बोलता है। रॉकी अपने साथ सत्तू (स्निग्धादीप चैटर्जी) को भर्ती करता है। सत्तू ने दिन रात पढ़ाई कर इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास की थी, लेकिन वो रॉकी की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर बहक जाता है और उसे लगता है कि दूसरों की जगह इम्तिहान देकर वो स्नातक होने से पहले काफी पैसे कमा लेगा। दूसरों की जगह इम्तिहान देने वालों को पैसा, ऐशो आराम शराब और सेक्स भी परोसा जाता था। फिल्म में सत्तू की कहानी खराब हो गई और वो इसलिए नहीं हुई क्योंकि उसे होना था, वो इसलिए हुई क्योंकि निर्देशक साहब उसे एक वैधानिक चेतावनी बनाना चाहते थे।

फिल्म की शुरुआत 1990 के दशक के यूपी के मैले कुचैले शहरों से होते हुए आज की मुंबई तक आती है जहां रॉकी ने अपना रैकेट बेहद मांग में चल रहे एमबीए परीक्षाओं तक फैला लिया है और यहां उसकी मुलाकात सत्तू की बहन नुपुर (श्रेया धनवंतरी) से होती है जिसने छोटे शहरों में लड़कियों के लिए दहेज में लपेट कर ब्याह दिए जाने वाले फंदे को छोड़कर भाग जाती है और फिर मुंबई में अपने दम पर करियर बनाती है। अब नुपुर स्वतंत्र है और उसे इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि रॉकी की पहली पत्नी उसके गांव में रहती है जिससे रॉकी की जबरदस्ती शादी हुई है।

फिल्म में हर स्थिति से बचने में माहिर बदमाश की भूमिका निभाने में इमरान हाशमी (फिल्म के सह निर्माता भी हैं) को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी है। वो रॉकी के किरदार में काफी स्वैग से निभाते हैं और किरदार के कमीनापन को कम करने के लिए एक चुटकी उदासी और इतनी ही ग्लानि का एहसास भी डाल देते हैं। फिल्म की पटकथा बहुत ही उबड़ खाबड़ है मतलब फिल्म एक लाइन पर नहीं चलती और इसकी एडिटिंग तो लगता है कि फिल्म नहीं जल्दबाजी में सब्जी काटी गई है। ये फिल्म दरअसल रॉकी को हीरो बनाकर पेश की गई है जबकि अगर फिल्म में नकली नैतिकता का पाठ नहीं पढ़ाया गया होता तो ये शायद एक सिस्टम के ढहने को दिखाने वाली ज्यादा ईमानदार और वाकई देखने वाली कॉमेडी फिल्म होती।

व्हाइ चीट इंडिया

निर्देशक – सौमिक सेन

कलाकार – इमरान हाशमी, श्रेया धनवंतरी, स्निग्धादीप चैटर्जी और अन्य

रेटिंग – 2.5 स्टार

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