फिल्म – ज़ीरो, स्क्रिप्ट – डबल ज़ीरो, लव स्टोरी – ट्रिपल ज़ीरो

Zero movie Shah Rukh Khan
Aanand L Rai's Zero stars Shah Rukh Khan with Anushka Sharma and Katrina Kaif

यहाँ पढ़िए ज़ीरो का इंग्लिश में रिव्यु: लिंक

दीपा गहलोत

जब एक निर्देशक एक सुपरस्टार को वस्तुत: छोटा करता है तो उस कहानी को इसके साथ न्याय करना चाहिए नहीं तो वो सिर्फ एक फिल्मी हथकंडा बनकर रह जाता है – फिर उसे देखकर लोग यही कहते हैं कि अरे देखो वीएफएक्स टेक्नीशियन क्या कर सकता है।

फिल्म देखकर आपको एक बार भी नहीं लगेगा कि अगर शाह रुख का किरदार फिल्म में सामान्य कद काठी (ऐसा फिल्म में कहा गया है) का होता तो फिल्म अलग होती। शाह रुख का बौना होना कहानी की मांग नहीं बल्कि दर्शकों को सरप्राइज देकर फिल्म हिट कराने का हथकंडा ज्यादा लगता है।

आनंद एल राय की ज़ीरो में शाह रुख खान ने बऊआ सिंह का किरदार निभाया है जो बौना है लेकिन अपने कद की कमी और परिवार की उपेक्षा (हालांकि फिल्म में ऐसा लगताहै कि परिवार वाले उन्हें तड़क -भड़क खर्चे के लिए पूरा पैसा देते हैं) को अपने स्वैग स्टाइल से पूरा करता है।

हमेशा अपने जिगरी यार गुड्डू (मोहम्मद जीशान अयूब) के साथ दिखने वाला 38 साल का मेरठिया बऊआ फिल्म स्टार बबिता कुमारी (कैटरीना कैफ) पर फिदा है और उसके दोस्त बबिता कुमारी को भाभी कहकर बुलाते हैं।

बऊआ की एक फोटो रिश्ते कराने वाली कंपनी में होती है और इसके जरिए वो आफिया (अनुष्का शर्मा) से मिलता है जो एक वैज्ञानिक होती है और दिमागी लकवे की वजह से व्हीलचेयर पर है। फिल्म में नाटा बऊआ आफिया को रिझाता-लुभाता है तो उसे बुरा लगता है क्योंकि बऊआ उसके स्तर का किसी भी लिहाज से नहीं होता।

लेकिन बऊआ उसे रिझाने की लगातार कोशिशें करता है और सफल भी हो जाता है। खुद को मध्यम वर्ग काकहने वाला बऊआ सिर्फ होली के जश्न पर ही 6 लाख रुपए इसलिए खर्च कर देता है ताकि आफिया के साथ हमबिस्तर हो सके और जैसे ही उसका मकसद पूरा होता है वो अपना नंबर बदलकर गायब हो जाता है इसका तर्क वो ये देता है कि वो एक कोयल है जिसका काम दूसरे पक्षियों के घोंसलों में अंडे देना है (तो भईया फिर शादी वाले दफ्तर में रिजस्ट्रेशन क्यों करवाया था?) अब आशिया उसके पीछे पड़ती है और मामला शादी तक पहुंचता है तो बऊआ शादी के दिन ही भाग जाता है क्योंकि उसके पास बबिता से मिलने का मौका होता है जो उसे शराब पीकर एक बार किस कर चुकी है।

बबिता से मिलने के मौके को कहानी में किसी तरह घुसाने के लिए बताया गया है कि बऊआ एक डांस कॉम्पटीशन के फाइनल में पहुंच जाता है (अब कोई बताए कि इस कॉम्पटीशन का एलिमिनेशन राउंड कब हुआ था ?) फाइनल में पहुंचने के इनाम के तौर पर उसे बबिता के साथ डेट करने का मौका मिलता है। बबिता का उसी समय दिल टूटा रहता है और वो बऊआ को अपना हमराज बना लेती है, जिस पर बहुत कोशिश के बावजूद भी भरोसा करना मुश्किल होता है।

अब फिल्म में बऊआ को अच्छा इंसान भी दिखाना होता है इसलिए उसे ये महसूस भी होता है कि वो आफिया ही है जिससे वो सच्चा प्यार करता है और फिर बिना किसी परेशानी के वो ना सिर्फ अमेरिका बल्कि नासा भी पहुंच जाता है। नासा में आफिया मंगल ग्रह को आबाद करने के अरबों डॉलर के स्पेस प्रोग्राम में काम कर रही होती है।

फिल्म की बात करें तो सबसे पहला तो यही है कि ये कतई दिलचस्प नहीं है। लेकिन फिर भी शाह रुख का जादू फिल्म तो थोड़ी देर तो ढोता है लेकिन आखिर में वो भी थक जाता है । फिल्म हड़बड़ी में बनी है या इत्मिनान में, अगर इस पर टिप्पणी नहीं की जाए तो भी एक बात तो तय है कि फिल्म देखकर अमेरिका कम से कम किसी भारतीय को स्पेस के ऐसे बड़े प्रोग्राम देना बंद कर ही देगा। वीएफएक्स से शाह रुख छोटे कद के नहीं दिखते बल्कि ऐसा लगता है कि किसी ने उनकी लंबाई काटकर बच्चों के बराबर कर दी है। इसलिए फिल्म में उनका कद छोटा नहीं दिखता बल्कि वो छोटे दिख रहे हैं । हालांकिफिल्म के कुछ सीन अच्छे लगे हैं फिल्म का सबसे बुरा पक्ष उसकी दिशाहीन स्क्रिप्ट और बेमन से दिखाई गई लव स्टोरी है क्योंकि सभी एक्टरों ने अपनी तरफ से पूरी मेहनत की है।

अनुष्का शर्मा एक मंझी हुई कलाकार हैं और कटरीना ने भी बबिता की भावनात्मक जरुरतों को पर्दे पर शानदार ढंग से उतारा है फिल्म सिर्फ एक सवाल के साथ आपको छोड़ती है कि आखिर स्क्रिप्ट में आनंद राय और शाह रुख को ऐसा क्या दिखा कि वो ऐसी निराशाजनक बेकार फिल्म बनाने गए।

जीरो

निर्देशक – आनंद एल राय 

कलाकार– शाह रुख खानअनुष्का शर्माकैटरीना कैफ और अन्य 

रेटिंग – 2 स्टार

(अनुवाद: ईश्वरी क्रिएशन्स)

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