पेट्टा देखिए, रजनी की दुनिया में खो जाइये


Petta starring Rajnikanth movie review

दीपा गहलोत

रजनीकांत के लिए दीवानगी तमिलनाडु या दक्षिण भारत से बाहर ना तो समझा जा सकता है और ना ही समझाया जा सकता है। रजनीकांत की ये दीवानगी ऐसे लोगों से बनी है जो उनकी फिल्म का पहलो शो देखने के लिए भोर में उठकर थियेटर नाचते हुए जाते हैं, उनके पोस्टर को मालाओं से लाद देते हैं, दूध से उनके आदमकद कटआउट्स का अभिषेक करते हैं और इन सबके बाद भी अगर फिल्म निराश करती है तो उन्हें खुश करने के लिए कुछ तो करना होगा।

जब फिल्म के क्रेडिट में नाम की जगह वर्ल्ड सुपरस्टार जाने लगे तो आसमान की ऊंचाई वाली ऐसी स्टारडम के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही हो जाती है कि फैंस एक ही चीज बार बार देखना चाहते हैं। रजनीकांत की कई फिल्में प्रचार और फैंन्स के प्यार के पैमाने पर खरी नहीं उतरीं लेकिन कार्तिक सुब्बाराज ने सही माएनों में बकवास को हटाकर ‘थलाइवा’ की वापसी उनके दीवाने फैंस के बीच कराई है। रजनीकांत की वापसी सदाबहार और अपराजेय अवतार के तौर पर हुई है।

फिल्म पेट्टा दरअसल एक फैन की तरफ से रजनीकांत को एक भेंट है। फिल्म में रजनीकांत की पिछली हिट्स की झलक तो है लेकिन इसके साथ ही उनके प्रचलित इमेज को एक ताजगी के साथ प्रस्तुत किया गया है। फिल्म की टैगलाइन ही है- रजनीकांत की दुनिया में खो जाओ, जो एकदम सटीक भी लगती है।

उत्तर भारत के एक हिल स्टेशन पर एक कॉलेज है जहां के छात्र इतने उदंड हो जाते हैं कि सभी टीचर उनसे डरते हैं और ये साफ हो जाता है कि इस जगह को सुधारने के लिए एक रक्षक की जरुरत है। तभी फिल्म में नए हॉस्टल वॉर्डन के रुप में काली ( रजनीकांत ) की फुल सीटी वाली इंट्री होती है। फिल्म में ये तो साफ हो जाता है कि नाचने- गाने और रोमांस करने वाला ( इस बार रजनीकांत युवा लड़कियों से नहीं बल्कि एक बच्ची की मां बनीं सिमरन से इश्क कर रहे हैं ), माइकल ( बॉबी सिम्हा ) के कॉलेज गुंडों के गैंग से लड़ने वाला और युवा प्रेमियों की कॉलेज में मदद करने वाला काली वो है नहीं जो दिखता है।

फिल्म में एक फ्लैशबैक में विलेन सिंगार सिंह ( नवाजुद्दीन सिद्दीकी ) और उसके बिगड़ैल बेटे जीतू ( विजय सेतुपति ) का खुलासा होता है  जो वर्तमान में काली से टकरा जाते हैं और फिर काली उनसे अपने ही अंदाज में निपटता है।

कहानी में काफी उतार चढ़ाव है जिसमें नब्बे के दशक के एक्शन के सारे सजावटी हथकंडे मौजूद रहते हैं। लेकिन इस फिल्म में इसे नब्बे के दशक से ज्यादा अच्छे ढंग से किया है जिसमें रजनीकांत का करिश्मा पूरी तरह दिखता है। फिल्म में काली की दुनिया में सारे मर्द ही हैं और हीरोइनों में सिमरन, त्रिशा, मालविका मोहनन, मेधा इन सबके पास करने के लिए फिल्म में ज्यादा कुछ है नहीं और उनके किरदार सजावटी तौर पर ही दिखती हैं। एक बार जब फिल्म प्लॉट से हीरोइनें हटती हैं तो फिर फिल्म का अधिकतर समय मारधाड़ से ही भरा जाता है। तमिल बोलने वाले दर्शकों को इस फिल्म के डॉयलॉग में छिपे राजनीतिक संदेश को समझने में दिक्कत नहीं आएगी।

पेट्टा में रजनीकांत पुराने अंदाज में ही नजर आए हैं लेकिन फिल्म में उनके लुक में जो ताजगी , तरुणाई और स्टाइल है वो हैरान कर देगी। ( फिल्म में उनके स्टाइल और जवानी की तारीफ करने पर रजनीकांत जवाब भी देते हैं ’बट नैचुरली’ ) इस फिल्म में रजनीकांत ने वही किया है जो फैंस उनसे चाहते हैं। थिरु का कैमरा और अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत रजनीकांत के किरदार और ताजगी दोनों को बरकरार रखने में काफी मददगार साबित हुए हैं। इस फिल्म से कार्तिक सुब्बाराज ने रजनीकांत को वो स्वैग वापस दिलाया है जो पिछली कई फिल्मों में नहीं दिखा। पेट्टा का ब्लॉकबस्टर होना तय है।

फिल्म – पेट्टा

निर्देशक – कार्तिक सुब्बाराज

कलाकार- रजनीकांत, त्रिशा, विजय सेतुपति और नवाजुद्दीन सिद्दीकी व अन्य

रेटिंग – 3 स्टार

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