धूम्रपान: शान्ति की तलाश स्मोकिंग ज़ोन में

धूम्रपान प्ले
Scenes from Akarsh Khurana's Dhumrapaan

यहाँ धूम्रपान का इंग्लिश में रिव्यु पढ़िए: https://xyngr.com/theatre/seeking-solace-in-a-smoking-zone-dhumrapaan/

दीपा गहलोत

सिगरेट के डब्बे पर स्वास्थ्य चेतावनी और कैंसर मरीजों की डरावनी तस्वीरें लगी होती हैं लेकिन क्या ये किसी को डराकर रोकता है ? हर जगह के स्मोकिंग ज़ोन धुंआ उड़ाते लोगों से भरे रहते हैं जो कल धुम्रपान छोड़ने का वादा कर आज जमकर कश भरते हैं।

ऐसा ही एक स्मोकिंग रुम या धूम्रपान कक्ष एक कॉर्पोरेट ऑफिस में होता है जो डी फॉर ड्रामा के हिंदी अंग्रेजी नाटक धूम्रपान का सेट है। नाटक को लिखा अधीर भट्ट ने है (इन्हें बेस्ट ऑरिजनल स्क्रिप्ट के लिए 2017 का महिंद्रा एक्सीलैंस इन थियेटर अवार्ड META मिला है।) और इसका निर्देशक आकर्ष खुराना ने किया है। ये नाटक दफ्तर में होने वाले तनाव और कैसे इसकी वजह से स्मोकिंग एरिया के प्रबंधकों के लिए पनाहगाह और युद्ध क्षेत्र में बदल जाने का ताना बाना है।इन प्रबंधकों का बॉस बेहद कठोर और निर्लज्ज रस्तोगी (कुमुद मिश्रा) है जो खुद सिगरेट पीता है।

नाटक का सेट बेहद साधारण है, मंच पर शीशे का एक निर्जीव सा पिंजरा है जहां सिगरेट पीने वाले तनावग्रस्त नशेड़ियों का जमावड़ा लगता है (नाटक में नशेड़ी लाल टाई बांधे होते हैं जिस पर हफ्ते के दिन लिखे होते हैं)। एकनाथ (शुभ्राज्योति बराट) सीनियर हैं जिन्हें कुछ महीनों बाद रिटायर होना है।अपनी उम्र के बाकी लोगों की तरह ही एकनाथ भी मोबाइल से सिर्फ बात ही करते हैं और नए जमाने की भाषा और रफ्तार से तालमेल नहीं बिठा पाते हैं। ओवेन (सिद्धार्थ कुमार) ने वैसे तो सिगरेट छोड़ दी है लेकिन अक्सर वो धूम्रपान करने वालों की भीड़ में आता है और मांगकर एक दो कश खींच लेता है। वो कंपनी के कंप्यूटर सिस्टम का प्रभारी है और हमेशा आशंकित और घबराया हुआ दिखता है। मितेश (घनश्याम लालसा) और सौरभ (सिद्धार्थ काकर/ सौरभ नायर) बेहद प्रतिस्पर्धी और डरावने कॉर्पोरेट जगत की फिसलनभरी सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हैं। मितेश पारिवारिक इंसान है जो अपने इस फंसे हुए अस्तित्व से नफरत करता है और उसका सपना एक कवि बनने का है, वहीं सौरभ हीनभावना से ग्रस्त ठेठ छोटे शहर का लड़का है । इसी ग्रुप में बिगड़ैल कुनाल (अभिषेक साहा/ तारुक रैना) की इंट्री होती है जो लोगोें से कहता है कि वो बस टाइम पास करने आया है। एकनाथ और सिगरेट पीने वाली इकलौती महिला (लिशा बजाज) की गलती से कंपनी में एक बड़ा संकट खड़ा हो जाता है।

अधीर भट्ट की भाषा पर खास पकड़ है और उन्हें ये अच्छी तरह पता है कि युवाओं के जीवन में बड़ी परेशानी क्या है । एक्टिंग की बात करें तो धूम्रपान में सिद्धार्थ कुमार का अभिनय उनके अवार्ड जीत चुके नाटक ‘द इंटरव्यू’ (आकर्ष खुराना निर्देशित) के स्तर का है। वो नाटक भी निर्दयी कॉर्पोरेट जगत पर ही था जो धूम्रपान से ज्यादा मजाकिया और डार्क था। भट्ट ने इस नाटक में ज्यादा ऐसे किरदार गढ़े हैं जिनसे लोगों को सहानभूति होती है। दर्शक किरदारों के नौकरी छूटने के डर, जबरन की जा रही नौकरी में दम घुटने की अनुभूति, दूसरों से आगे रहने की कोशिशों में खुद को तलाश सकते हैं। नाटक में एक और कहानी चलती है, एक युवा लड़की की जिसकी जद्दोजेहद भेड़ियों के बीच किसी तरह खुद को बचाकर रखने की है, जिसे कहानीकार के शब्दों का इंतजार रहता है। ये #मीटू के इस दौर में ज्यादा प्रासंगिक है।

धूम्रपान
निर्देशक- आकर्ष खुराना
लेखक – अधीर भट्ट
कलाकार- कुमुद मिश्रा, शुभ्रज्योति बरात, सिद्धार्थ कुमार और अन्य
रेटिंग – 3 स्टार

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